Saturday, April 13, 2013


खाना, पीना', हगना, मूतना
वीरेन्द्र कुमार सिंह  

चार पूरक सहजीवी क्रियाएं। इनकी निरंतरता ही हमारे जिंदा होने का सबब और सुबूत हैं।  इनमें से प्रथम दो क्रियाएं जहाँ आगत क्रियाएं हैं वहीं अंतिम दो निर्गत। हम अपने घरेलु संस्कारवश आगत का स्वागत और निर्गत का  विकार के रूप में तिरस्कार करते रहे हैं। कुछ लोग मानते हैं कि आगत निर्गत की क्रियाएं द्वैतवाद के सिद्धांत का अनुपालन करती हैं तो कुछ मानते हैं कि अद्वैतवाद का। लेकिन इस ज्ञान-मीमांसा का ज्यादा असर आम आदमी पर हुआ प्रतीत नहीं होता। आम आदमी की आस्था निर्गत में ज्यादा दीखती है। वह निर्गत के आधार पर ही आपके स्वास्थ्य की मुक़म्मल जानकारी पा  लेता है। डाक्टर-वैद्य भी निर्गत के आधार पर ही अपना नुस्खा अग्रसारित (recommend)  करते हैं। 

कोई आपसे आपके तबीयत के बारे में पूछे और आप कहें कि ठीक है किन्तुवह तपाक से पूछ बैठेगा - पेशाब-पैखाना तो नियमित है ? कोई मानसिक परेशानी चेहरे पर चस्पां हो तो आत्मीय जन जान लेंगे कि आप सुबह में ठीक से फारिग नहीं हो पाए होंगे। मुझे अबतक के जीवन में कोई ऐसा नहीं मिला जो यह जानता हो कि सुबह में आसानी से फारिग होने के उपचार क्या हैं? कल एक मित्र से यूँ ही तफरी में कुछ तफरी की बातें हो रही थीं कि अचानक वे मेरी निजी आदतों के बारे में जानकारी माँगने लगे। 

'सुबह जगने पर आप पहला काम क्या करते हैं?'  
'भई, जगते ही कौन काम रता है कि मैं करूँ?' मैंने कहा।

उन्होनें इसे मेरा मजाकिया अंदाज़ माना और अपनी सलाह-सरिता को बहते रहने दिया। 'मित्र मैं तो एक छोटी-सी सलाह दे रहा हूँ।कुछ और करें या नहीं करें, एक काम करना कभी भूलियेगा। कोई भी परिस्थिति हो, सुबह जगने के तुरंत बाद मिटटी के घड़े का एक लोटा शीतल जल सेवन  कीजिये, घर में डाक्टर-वैद्य की ज़रूरत कभी नहीं पड़ेगी।'

'सो कैसे?' मैंने पूछा।

मेरे सवाल सुनकर वे प्रोत्साहित हो उठे। कहने लगे, " बाहर की गन्दगी हो या भीतर की, बिना आग और पानी के दूर नहीं हो सकती। आग और पानी के बगैर तो मंत्र भी प्रभावी नहीं रह जाते। यही karan है कि मंत्र जाप के साथ साथ पुजारी या तो आग की आरती करता है या जल का छिड़काव। सुबह पानी पीने से शरीर में जमी रात भर की गन्दगी पेशाब के साथ निर्गत हो जाती है और शौच को पुनार्सिंचित कर गाढ़े तरल पदार्थ में तब्दील कर देता है। गन्दगी के सफल निर्गम के बाद आपका शारीर फिर से तरोताजा हो जाता है और दुगुने वेग से क्रियाशील हो उठते हैं।‘ वे कहे जा रहे थे कि मैंने टोका।  

'यार, बात क्या थी और तुम कहाँ पहुँच गए?' मैंने मिन्नत की तरह अपना प्रतिवाद जताया। 

झेंपने की जगह मेरे प्रतिवाद की बात सुनकर वे तटस्थ हो गए।  बकने लगे, " सुखदायी निवृति के पश्चात मन भी निष्कलुष हो उठता है। लेकिन सोच को सुखद बनाने के लिए पानी पीना ज़रूरी है।पेट के अन्दर पहुंचकर पानी ही वह केंद्रीय दबाव पैदा करता है जिसकी वज़ह से निर्गत की क्रिया संचालित होती है। फिर तुम यह भी जानते हो कि निष्कलुष मन में ही ईश्वर का वास होता है। जानता हूँ कि तुम नास्तिक हो, लेकिन सुबह-सुबह जब तुम्हारे मन-मस्तिष्क-हृदय-आत्मा के आँगन में सुखद शौच के फलस्वरूप शुचिता के अनगिन मनिरत्न पवित्र आलोक फैला  रहे हों, तब दो मिनट के लिए परम पिता परमेश्वर को याद कर लेने में क्या हर्ज़ है?’

'अबे, तुम मुझे नास्तिक समझते हो कि चूतिया? क्यों याद करूँ तुम्हारे परम पिता परमेश्वर को? तुम अपने मन में अपने ईश्वर को आश्रय दो, लेकिन मेरे मन में कोई भी जगह खाली नहीं है तुम्हारे ईश्वर के लिए। तुम्हें कोई और काम है या नहीं? बिन पूछे सलाह देने की नौकरी तो नहीं दे दी किसी ने तुम्हें? अगर नहीं तो फिर क्यों एक ही झटके में शौच से शुरू होकर सुरपुर तक की यात्रा कर डाली? अरे, अपने भगवान को संडास तक तो मत घसीटो!' मैं खीझ में कुछ से कुछ बक गया। सोच रहा था कि कहीं वे बुरा मान जायें! लेकिन मित्र हो तो ऐसा जो अपनी बुराई भी निर्मल मन से सुने। 

उनका चितवन चित्त ज़रा भी मलिन हुआ। उल्टे, वे सर्वज्ञ हो गए और बांचने लगे, “'तुम जो भी कहो, सच यही है कि भगवान हर ज़गह है। संडास में भी। मैं तो यह कहता हूँ कि प्रत्येक प्राणी के जीवन के विधान का अनुपालन उसकी उपस्थिति और सीधी देखरेख में संभव होता है। वह खाने, पीने,  मुतने हगने में हमारी मदद करता है। जहाँ वो नहीं है वहां कुछ भी नहीं है।' यह उसाकी अंतिम दहाड़ थी।

मैं निरुत्तर हो गया। उसने मेरे संडास में प्रभु की मूर्ति स्थापित कर दी थी। मैं जान गया कि यह ईश्वर नामक जंतु अजर-अमर क्यों है। आकाश, धरती और पाताल तक की आबोहवा में उसके जीने की परिस्तितियाँ मौजूद हैं। लेकिन एक बात अब भी मन में ab bhi तबाही मचाते रहती है। वो ये कि  अगर ईश्वर सबके बगैर जी सकता है, तो मनुष्य के बगैर जीकर दिखाए? किसी और प्राणी ने तो घास डाला  नहीं? ले दे के सबसे बड़े उज़बुक हमीं रहे। अपनी बुद्धि को मिटटी का लोंदा बनाकर लोंदे की ही पूजा करने रहे। अगली बार यह मित्र फिर आया तो कहूँगा कि जा जहाँ ठूँसनी है, ठूंस ले अपने ईश्वर को, लेकिन मुझसे ऐसी ऊल-ज़लूल बातें मत किया करो। मैं तुम्हारे मानस-पुत्र का कोई अस्तित्व नहीं मानता। सुबह में पानी पीऊंगा, लेकिन प्रार्थना नहीं करूँगा और ही फ्रीज़ बेचकर मिटटी का घड़ा खरीदूंगा। आओ, देखो और ढूंढो कि मेरे  शौच में तुंहारा ईश्वर कहाँ छुपा बैठा  है। मैंने तुन्हारे मानस-पुत्र की मूर्ति संडास से हटवा दी है।     

1 comment:

  1. Sir..shabd nahi mil rahe kuchh,kyoki meri ishwar me aastha to hai par vishwash nahi..khair..KYA KHOOB LIKHA HAI APANE...

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