Monday, April 8, 2013


गुरु-दक्षिणा
 
भौतिकी के प्रोफ़ेसर मेहता साहेब को लाल कपडे में लिपटी कोई किताबनुमा चीज ले जाते हुए देखकर मुझे बड़ा अचरज हुआ. सच पूछिए तो वे ख़ुद इसकी अपेक्षा कर रहे थे. वे मुझे न देखते हुए की मुद्रा में देख रहे थे और मैं उनके इस न देखते हुए को देख रहा था. आँखें टकराईं और मेरे दोनों हाथ उनके सामने अभिवादन की गरज से जुड़ गए. जितनी ललक मेरे मन में उनसे कुछ पूछने की हो रही थी, उससे कहीं ज़्यादा  वे ख़ुद  पूछवाना चाह रहे थे. किंतु, पहल कौन करे का धर्मसंकट हम दोनों के बीच कुछ देर तक पसरा रहा. अंततः गुरु-शिष्य परम्परा की दुहाई देते  मुझे ही मौनभंग (धनुर्भंग का नहीं) करने का पातक कर्म करना. पड़ा. में धृष्टता के लिए कोई जगह नहीं छोड़ना चाहता था, सो अपने संकोच को भी संस्कृत बनाने की दुविधा में क्षणभर के लिए  ठिठका, फिर  पूछ बैठा  , 'सर, पोथी-  पतरा से आपका यह नया लगाव मेरी समझ में नहीं  आता.
 
दुलत्ती लगने पर जो चोटिल सतर्कता आ जाती है, कुछ उसी भाव से प्रोफ़ेसर मेहता ने चौंकने की कोशिश और एक प्रतिप्रश्ना मेरी तरफ़   उछाल दिया,. फिर बोले, 'अगर मैं कहूं कि यह पोथी-पतरा नहीं, अपितु विज्ञानं कि प्रथम और अंतिम किताब है तो तुम यही न कहोगे कि मेहता साहेब कहीं सनक तो नहीं  गये. अब इतना तो ठीक से याद नहीं है कि उनकी यह बात सुनकर विस्मय से पहले मेरा मुंह खुला था या मेरी आँखें विस्फारित हुईं थीं, किंतु इतना आज भी मुझे याद है कि प्रोफ़ेसर मेहता मेरी संज्ञा से पूर्णतः निर्विकार रहते हुए अपनी लाल पोटली खोलने में व्यस्त हो गये थे. उनकी आंखों कि चमक किसी अविश्वसनीय 'उरेका'  की उपलब्धि को समानुपातिक ढंग से दर्शा रही थीं.
 
"यह वेद है' - मुनि वेदव्यास द्वारा रचित, उन्होनें  कर्णभेदी आवाज़ में कहा..
"यह तो प्राचीनतम धर्मग्रन्थ है, सर! . मैंने अपने सीमित ज्ञान के आधार पर पूछा. 
 
 "नासमझ हो तुम! तुम भी उन्हीं ब्राहमणों के सुर में सुर मिला रहे हो जिन्होनें विज्ञानं कि इस अमूल्य धरहर को धर्मग्रंथ कहने का दुस्साहस किया? मालूम भी है कि  इस वेद में विज्ञानं के इतने सूत्र भरे पड़े हैं पश्चिनी देशों के तमाम वैज्ञानिक सूत्र उसके दसांश के बराबर भी नहीं ठहरते. पश्चिमी देशों के लूटेरे इसी किताब से सूत्र ढूंढ-ढूँढ कर वैज्ञानिक बन गये और हम अबतक अपनी नादानी को ही बुद्धिमानी समझते रहे. '

"सो कैसे सर? मैंने अपनी उत्सुकता का इज़हार करते हुए पूछा.

प्रोफ़ेसर मेहता की आवाज़ संयत हुयी और मुखमुद्रा पर स्मित मुस्कान कि एक तिर्यक रेखा खींच गयी. फिर वे दार्शनिक अंदाज़ में कहने लगे, "यही गुरुत्वाकर्षण की बात ले लो. दुनिया सिर्फ़ यह जानती है कि इसके नियमों का उदघाटन न्यूटन ने किया,, लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि न्यूटन को यह अक्ल आयी कहाँ से? सेवों के बाग़ से या हमारी  प्राचीन पुस्तकों से चुराए गये सूत्रों से?  मैं पूछता हूँ कि क्या त्रिशंकु का ही नया नाम गुरुत्वाकर्षण नहीं है? इसे ही कहते हैं नयी बोतल में पुरानी शराब.'  इतना कहते-कहते  प्रोफ़ेसर साहेब कुछ बुदबुदाने लगे. सामीप्य का फायदा उठाते हुए मैंने अपने  कानों को उनके मुंह के नीचे स्थिर कर लिया. वे अंग्रेज़ी में कुछ कहे जा रहे थे जिसका सारांश मैंने यह निकाला कि हमारी मानसिकता आज भी कोलोनिअल हैंग ओवर से पीड़ित है. 
 
उस दिन बात इतनी ही हो सकी क्योंकि प्रोफ़ेसर मेहता को सब्जी लेकर घर जाने की जल्दी हो रही थी. रुखसत लेने से पहले प्रोफ़ेसर मेहता ने बताया कि कल वे फुरसत में रहेंगे और मैं सुबह करीब दस बजे उनके घर पहुँच जाऊं. मैं अन्दर-अन्दर अपने आप पर इतराने लगा. कहाँ तो प्रोफ़ेसर मेहता के पास बड़े-बड़े लोगों से भी मिलने की फुर्सत नहीं होती और कहाँ मुझे बिना पूछे बुलावा मिल रहा है!    हाय रे विधाता! तेरी महिमा अगम अपार. तेरी इनायत हो जाए तो राजा रंक और रंक राजा बन जाए. क्या तुमने शबरी के जूठे बेर नहीं खाए थे? क्या तुमने गरीब सुदामा को एक ही झटके में मालामाल नहीं कर दिया था? प्रोफ़ेसर मेहता के बुलावे से मेरा मन भी इसी भाव-तरनी में डूबने उतराने लगा. मैं उनकी ज्ञानवर्षा में स्नान कर अपना जीवन कृतार्थ करने के लिए बेचैन हो उठा.
 
अगला दिन. रविवार. मैं दस बजे के बजाय आठ बजे ही प्रोफ़ेसर मेहता के घर पर विराजमान हो गया. मिसेज़ मेहता ने दरवाज़ा खोला और बैठकखाने मैं बैठकर अखबार के पन्ने पलटने लगा. अभी कोई ज़्यादा वक्त नहीं गुज़रा था कि मुझे बगलवाले कमरे से मंत्र कि ध्वनि सुनायी पड़ी.

 कोई उस कमरे में गायत्री मंत्र की जाप किए जा रहा था. शुरू में तो स्पष्ट नहीं हुआ, किंतु मंत्रजाप की आवृति से मुझे यह जानने में कोई कठिनाई नहीं हुयी की यह प्रोफ़ेसर साहेब की ही आवाज़ है. करीब आधा घंटा बाद जब प्रोफ़ेसर साहेब कमरे में अवतरित हुए तो मैं दंग हुए बिना नहीं रह सका. यह कौन? तेलगु फिल्मों में विश्वामित्र की भूमिका अदा करनेवाले एन. टी. रामाराव., मैंने मन ही मन पूछा.
पहुंचे हुए ज्योतिष की भांति प्रोफ़ेसर मेहता मेरे मन की दुविधा ताड़ गए. अत्यंत वात्सल्य का परिचय देते हुए ख़ुद ही बताना शुरू कर दिया. "मैंने जो गेरुआ रंग के वस्त्र पहन रखे हैं, उसे तुम पाखंडी योगियों का ढोंग ही समझ रहे होगे. किंतु, मैं तुम्हें बता देना चाहता हूँ कि इस्सके पीछे कोई ढोंग-वोंग नहीं है, अपितु शुद्ध वैज्ञानिक कारण हैं. सबसे पहले तो यही कि यह गेरुआ रंग सोलर रेडिएशन के बुरे प्रभावों को नाकामयाब कराने में पूरी तरह समर्थ है. दूसरे, गेरुआ रंग हमारे  चित्त  को शान्ति प्रदान कर हमारे हृदय में सद्विचारों का संचार करता है. इस तरह तुम देख रहे हो कि मैंने अपने रोज़मर्रा के जीवन में रसायनशास्त्र और भौतिकी के सिद्धांतों का कितना बेहतर इस्तेमाल किया है. तुम्हें यह जानकर हैरानी नहीं होनी चाहिए कि आजकाल भारत गेरुआ वस्त्रों का निर्यात बड़े पैमाने पर फ्रांस को कर रहा है. कहने कि जरूरत नहीं कि प्रोफ़ेसर मेहता कि बातों से अब मैं विस्मित नहीं, विस्मृत हो रहा था.
 
"लकिन...? मैं पूछना चाह रहा था.
"पूछो, पूछो", प्रोफ़ेसर मेहता ने प्रोत्साहित किया.
"सर, सावित्री देवी की महिमा में गए जानेवाले गायत्री मंत्र के जाप की आप कौन-सी वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करेंगें. ' मैंने अपनी जिज्ञासा का इज़हार किया.
"खूब पूछा तुमने भी. प्रोफ़ेसर मेहता ने ठहाका लगाया.
"बुत आई रेअल्ली वांट तो नो अबाउट इट, सर'. मैंने खीसें निपोरते हुए कहा.
"तो बताओ, ध्वनि क्या है?'  प्रोफ़ेसर मेहता ने जवाबी हमला करते हुए पूछा.
"ध्वनि ऊर्जा का एक रूप होती है, सर. मैंने कहा.
"और ऊर्जा कार्य का निष्पादन करती है. करती है या नहीं? प्रोफ़ेसर मेहता के चहरे पर विजेता का स्पष्ट भाव आसानी से देखा जा सकता था.
"सर, ऊर्जा कार्य का निष्पादन ही तो करती है.'
"तब तो तुम्हें यह भी पता होना चाहिए कि रिदमिक ध्वनि में ऊर्जा कि मात्र बढ़ जाती है.' प्रोफ़ेसर मेहता एक बार फिर मुझे उल्हा कर गए. मैंने में हाँ में अपना सर हिला दिया. प्रोफ़ेसर मेहता अब आश्वस्त हो चुके थे कि मैं उनकी तर्क प्रणाली का भेदन नहीं कर सकता. फिर वे मेरे कंधे पर वात्सल्य की चिकोटी काटते हुए पूछा, आई ब्बत समझ में?'  मैंने लज्जित होते हुए अपनी सहमति जताई.
 
मुझे वर्तमाना शिक्ष पद्धति पर तरस आया की जिस ज्ञान अथवा विज्ञानं की मौलिकता की खोज प्रोफ़ेसर मेहता अकेले कर गए, उसकी तरफ़ की. वी. रमन., जे. की. बोस, पी. सी. राय, डाक्टर रमन्ना आदि अनेक वैज्ञानिकों का ध्यान तक क्यों नहीं गया. सच ही तो कहा था प्रोफ़ेसर मेहता ने कि हम आज भी कोलोनिअल हंगोवर से पीड़ित हैं. मैं उनकी इस अधुनातन खोज से इस कदर अभिभूत हुआ कि पूछिए मत. मन के कोने में रह-रहकर विचार आ रहा था कि हो न हो प्रोफ़ेसर मेहता को बोधिसत्व प्राप्त हो गया है. मैं अपने को धन्य मान रहा था कि मैं उनका स्नेहभाजन बना. मेरे हृदय में न जाने कहाँ से भक्ति  का कोई अज्ञात अजस्र सोता फूट  पड़ा था. विचारों में एक आदिम शिथिलता आती जा रही थी और मन किसी अज्ञात लोक में भटकने लगा था.   मैं अपराध बोध से दबा जा रहा था. मन रुआंसा और हताश हो रहा था. अंत में जब कुछ न सूझा तो फूट-फूटकर रोने लगा. प्रोफ़ेसर मेहता ने अगर मुझे बलात न उठाया होता तो सच मानिये मैं रोते रोते वहीं अपनी जान दे देता. उनहोनें मुझे झकझोरते हुए कहा कि यह वक्त रोने का नहीं सही संकल्प लेने का है. संकल्प लो तुम यथाशक्ति इस कोलोनिअल हैंग ओवर को समाप्त कराने में हमारा सहयोग करोगे और जो राष्ट्र खतरे में है, उसे मजबूती प्रदान करोगे.
 
वेद से विज्ञानं और विज्ञानं से राष्ट्र निर्माण की उनकी यह बात डाबर की जन्म-घूंटी की तरह पीता रहा, पता  नहीं कब यह घूंटी मृत-संजीवनी बन गयी और मैं दुगुने वेग से चेतन हो उठा. मैंने सहज भावः से स्वीकार कर लिया की मेरी अबतक की पढ़ाई सिर्फ़ तोतारटंत थी. असली पढ़ाई तो अभी भी कोसों दूर था. मैंने दूसरी शिक्षा के लिए  कमर कस लिया. अब पढूंगा तो सिर्फ़ प्रोफ़ेसर मेहता से, वरना अबतक हासिल की गयी तमाम डिग्रियों को आग के हवाले कर दूँगा. लेकिन, यह बात प्रोफ़ेसर मेहता से पूंछू भी तो कैसे? मरता क्या न करता की तर्ज़ पर मैंने भी फैसला कर लिया कि कुछ न कुछ तो अवश्य ऐसा करूंगा कि प्रोफ़ेसर मेहता का दिल पसीज जाएगा और वे मेरी विनती सुन लेंगे, पता नहीं क्या सूझा कि मेरी मुद्रा लगभग भीख मांगने वाले जैसी हो गयी. मेरी गुहार को प्रोफ़ेसर मेहता ने द्रौपदी कि गुहार माना, यह तो नहीं कह सकता लेकिन मुझे उनका आश्वासन कृष्ण द्वारा बढाई  चीर ही प्रतीत हुआ  अब  रूखस्ती लेने के लिए आतुर होने लगा. कुछ और भी काम हैं का बहाना बनाकर मैं रूखसती के लिए उठ खड़ा प्रती. प्रोफ़ेसर मेहता के होंठों पर वही चिर-परिचित मुस्कान बिखर गयी. 
 
मैं अभी मुदा ही था कि पीछे से प्रोफ़ेसर मेहता कि आवाज़ सुनाई पड़ी, "ठहरो'. मैं किसी अज्ञात भय से लगभग काँप-सा गया. मेहता साहेब ने मेरे कन्धों पर अपना दाहीना हाथ rakha और एक प्यार भरी चेतावनी देते हुए बोले, "कल तय्यारी करके आना. मेधावी छात्र की तरह मैंने उनका संकेत समझा और आज्ञाकारी छात्र की तरह खीसें निपोर दी.  रात को मेरी आँखों से नींद गायब थी. रताजगी करते हुए सोचता रहा, सोचता रहा, किंतु "पुष्पक विमान" का रहस्य जानने के अलावा कोई और सवाल शामिल ही नहीं हुआ भेजे में.     
 
अगले दिन मैं नियत समय पर प्रोफ़ेसर मेहता के घर पहुंचा. वे मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे. देखते ही चहकने लगे. किंतु मैं उनकी इस चहकन से बुरी तरह डर गया. मुझे लगा कि उनकी पारदर्शी बुद्धि निश्चित ही जान गयी होगी कि वायदे के विपरीत मैं पूरी तरह तैयार होकर नहीं आया हूँ. फिर सोचा कि गुरु से लाज कैसी और डर कैसा. मन कुछ हल्का होने लगा. मौन तोड़ते हुए उनने पूछा "कोई शंकालु प्रश्न लेकर आए हो?"
 
"कोई विशेष नहीं, सर.'  मैंने कहा.
"फिर भी? वे प्रोत्साहन देते हुए बोले..
" मैंने बहूत कोशिश की कि पुशापक विमान के बारे में कुछ जान सकूं , किंतु, जितना ही इसके बारे में सोचता हूँ, गुत्थी उतनी ही उलझती जाती है. सर, क्या ऐसा विमान सचमुच में कभी था?, इस बार बार मैंने सवाल सीधे दगा.
"सचमुच से तुम्हारा मतलब क्या है? क्या तुम यह कहना चाहते हो कि पुशापक विमान कोई मनगढ़ंत कोरी  कल्पना है? अरे नादान, यह विमान पश्चिमी जगत के वैज्ञानिकों के लिए रहस्य है, यह तो मैं समझ सकता हूँ. किंतु, पावन भारत भूमि का मनुज भी इसकी वैग्यनुकता पर शक करे, यह तो मैं सिर्फ़ तुमसे से सुन रहा हूँ. खैर, तुम अकेले नहीं हो जो ऐसा सोचता है. एकबार फ़िर वे मुझे लेक्चर पिला गए.
" सर, मैं आपका जीवन भर आभारी बना रहूँगा, अगर आप मुझे थोड़ा भी बोध सकें. मैंने अपना ब्रह्माश्त्र छोड़ा दिया था.
"शाबाश! इसबार पूरे मन से कहा उनहोनें. लेकिन विस्तार से कुछ भी बताने से पहेले वे यह जन लेना चाहते थे कि पुशापक विमान के बारे मेरी (सच पूछिए तो हम सबकी) जानकारी) क्या है.
" मेरी समझ  में पुष्पक विमान एक वैज्ञानिक कहानी है जो हमारे मस्तिष्क को सोचने के लिए विवश कर देती है, मैंने कहा.
"चलो, कोई बात नहीं. अब तुम ये बताओ कि किसी धातु कि तन्यता किस बात पर निर्भर कराती है?'
"प्रत्यास्थता गुणांक के मान पर, सर' मैंने कहा.
"और इसीलिए अगर किसी धातु का प्रत्यास्थता गुणांक असीम हो तो वह धातु परफेक्ट इलास्टिक मणि जायेगी. उनहोनें समझते हुए कहा. 
"तो क्या पुष्पक विमान किसी ऐसे ही धातु का बना था?' समझ की नासमझी में मैंने पूछा.
"हाँ. इसबार उनका संक्षिप्त सा जवाब था.
मुझे सत्य मिल गया था. मेहता साहेब की प्रशंशा उन्हीं के सामने कराने की ध्रिष्ठाता तो कर सकता थाकिंतु नाहक में अशिष्टता का परिचय क्यों दूँ, यही सोचकर चुप रह गया. सच तो ये है कि मेरी आवाज़ ही बंद हो गयी थी. आत्मचिंतन से ऊपजी मेरी चुप्पी का मर्म शायद समझ गए थे. सम्भव है, इसी वज़ह से उन्होनें और देरतक रूकने का आग्रह नहीं किया. जब मैं अभिवादन कर चलने के लिए उद्यत हुआ तो उन्होनें मेरे हाथ में एक लिफाफा इस हिदायत के साथ थमा दी कि मैं उसे घर जाकर हे खोलूँ.
घर आकर लिफाफा खोला तो पाया कि उसमें "युग निर्माण योजना" की सदस्यता स्लिप पड़ी हुयी है जिसके नीचे मोटे अक्षरों में गुरुदक्षिणा शब्द उकेरा गया था.
वीरेन्द्र 

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