Tuesday, April 9, 2013


कैसा क़र्ज़, किसका क़र्ज़?


'गुजरात का उतार दिया, अब देश का उतारूंगा'
'क़र्ज़, कलंक और अपमान।'
'गुजरात में झाड दिया है, अब पुरे देश में झाडूंगा।'.
भूत और सनक।

क़र्ज़, कलंक और अपमान से मुक्ति की कामना राष्ट्र-धर्म की स्थापना में सन्निहित है। भारत में राष्ट्र-धर्म की स्थापना बहुत पहले ही हो गई होती अगर आज़ादी के बाद भारतीय जनता के रहनुमाओं ने आनन-फानन में संविधान बनाया होता। मौजूदा रूप में यह संविधान ही राष्ट्र-धर्म की राह का सबसे बड़ा रोड़ा और सबसे बड़ी पेंच है। पूरा गड़बड़झाला सिर्फ इसलिए पैदा हुआ है कि सनातन धर्म और राष्ट्र-धर्म के बीच तो कोई संगति है कोई तालमेल। कहाँ तो तय था कि दोनों के बीच अनिरुद्ध हेलमेल की गुंजाईश पैदा की जाएगी और कहाँ आज दोनों को अलग अलग ताल में बजने के लिए मज़बूर कर दिया गया है। भई, जब पहले से सनातन सिद्धांत मौजूद थे तो क्या गरज पड़ी थी संविधान गढ़ने की? गड़बड़ तो होना ही था। संविधान बनाने का काम उनको दे दिया गया जो कभी 'धरम-करम का मरम' तक नहीं जानते थे। खैर, जहाँ चाह, वहां राह। मोदी का संकल्प इसी विसंगति को दूर करना है।       
अपने संकल्प को पूरा करने की एक जिद्द-सी रही है मोदी को। वे राष्ट्र-धर्म के निर्माण कार्य में सदैव तत्परउद्यत और उद्धत रहते आये हैं। इसके प्रमाण भी हैं।जहाँ उनका पूरा कुनबा ले-दे के एक पुराणी ईमारत को ध्वस्त कर बल्ले-बल्ले कर रहा था, वहीँ मोदी का मन उदास था। उन्हें अभी भी बहुत कुछ करना था। ईश्वर की माया देखिये कि यह मौका उन्हें ज़ल्द ही मिल गया। गोधरा में ट्रेन में आग क्या लगी कि मोदी को विश्वस्त सूत्रों से पता चल गया कि इसके पीछे गैर-सनातनियों की कारस्तानी है। दुश्मन का पता चल सके इसके पहले ही मोदी ने पूरी रणनीति तैयार कर ली थी। सनकियों को सबक सिखाने की गरज से उनकी मुक़म्मल शिनाख्त तो कर ही ली गयी थी, उन्हें सुरधामापुर पहुंचाने के दूसरे बदोबस्त भी कर लिए गए थे।  यह मोदी का ही प्रताप था कि अकेले गुजरात में हजारों घर गैर-सनातनियों के घर जला दिए गए, उन्हें आग, गोली और तलवार के हवाले कर दिया गया। तब जाके गुजरात में सनक उतरीअमन चैन कायम हुआ और वह विकास की राह पर तेज़ी से दौड़ाने लगा। नहीं, यह मानना बिलकुल गलत होगा कि जो जले या जलाए गए वे निर्दोष थे। भई, गैर-सनातनी तो थे ही वे। हजारों साल से ये नाशपिटे यहीं की रोटी खाते रहे, यहीं का पानी पीते रहे लें मशाल देखिये कि आज भी उनका धर्म अलग है। यानी देव-ऋषि-मुनि की बात बेकार और चरवाहे की बात अव्वल! कृष्णा जी की बात अलग थे, वे अवतार थे। सनातनी भगवान अपना मूल काम को आउटसोर्स नहीं करते। धर्म की किताब खुद लिखते हैं। गीता भगवान श्रीकृष्ण ने खुद लिखा था। जब देव खुद मुट्ठी में हों तो देवदूत की कौन सुने!    सनातनी अपनी उदारता नादानी में अबतक गैर-सनातनियों की ऊल-ज़लूल हरक़तों को बर्दाश्त करते रहे। लेकिन अब नहीं। Enough is enough.
राष्ट्र हित में आजीवन कुंवारे रह गए या मान लिए गए मोदी की बातों  से उनके आलोचक इत्तेफाक नहीं रखते।. हाल की बात लीजिये। मोदी ने देश का क़र्ज़ उतारने का संकल्प दुहराया तो भाई लोग हंगामा बरपा करने लगे।   खोजी पत्रकारिता में पकी आँखों ने तुरंत ही पता कर लिया कि मोदी गलतबयानी कर रहे हैं क्योंकि सी. .जी. की रिपोर्ट बताती है कि गुजरात भारत का तीसरा सबसे  क़र्ज़खाऊ प्रान्त है। गुजरात से ज़्यादा क़र्ज़ सिर्फ ओडिशा और पश्चिम बंगाल के सर पर है। मुझे लगता है कि मोदी के आलोचक साहित्यविमुख  शुष्क-संवेदना के लोग हैं। और इसीलिए  वे मोदी जी की भाषा से  अभिधा, व्यंजना को  अलग कर या  ताक पर रखकर सिर्फ शब्दार्थ को लेकर माथापच्ची कर रहे हैं। भाई लोगों ने अपनी नादानी में मान लिया कि क़र्ज़ का मतलब सिर्फ रुपये-पैसों का मामला  होता है। वे भूल गए कि मोदी जिस सनातनी परंपरा के  पहरुआ हैं उस परंपरा में धन को माया त्याज्य माना गया है। माया की महिमा में सनातनी यकीन नहीं करते। माया-उत्पादों को क़र्ज़ तो हरगिज़ नहीं मानते।   

मोदी जी नादान नहीं हैं। वे जो भी बोलते हैं, सोच-समझकर बोलते हैं। उनकी हर बात परंपरा-स्यूत होती है। वे जानते हैं कि दुनिया में भारत का सिर अर्थ-भार से कभी नहीं झुकेगा।  पैसा क्या है? हाथ का मैल। मैल यानी गन्दगी। बाहरी दुनिया की मैल जहाँ हमारे कपड़ों त्वचा को गन्दा करती है, वहीँ विचारों संस्कारों की मैल हमारे चरित्र को  दूषित-कलंकित करती है। पैसा हमारे मन में लोभ जगाता है और लोभ में हम वह सबकुछ करने लग जाते हैं जिसे सात्विक मनुष्य कभी नहीं करना चाहेगा। चूँकि मोदी सनातनी  सात्विक हैं, इसलिए यह तय है कि वे जिस क़र्ज़ की बात कर रहे हैं, उसका सम्बन्ध रुपये-पैसों से होकर किन्हीं और चीजों से है। मोदी मानते हैं कि इस देश पर आज भी के कई तरह के क़र्ज़ लदे हुए हैं। और सनातनी होने के नाते वे जानते हैं कि क़र्ज़ चुकाए बिना मुक्ति नहीं मिलती, चाहे वह अर्थ का क़र्ज़ हो या फिर इतिहास विरासत का। भारत के सनातनी इतिहास में  जो कुछ भी असनातनी है उसे मोदी और उनके कुनबे के लोग कलंक यानी मैल यानी क़र्ज़ मानते हैं। ज़ाहिर है कि सनातनी लोग इस कलंक को धोयेंगे, मैल को खरोच-खरोच कर छुडायेंगे और इस तरह अपना क़र्ज़ उतार लेंगे। कलंक धोने तथा मैल छुडाने के क्रम में  कभी किसी की त्वचा का छिल जाना अथवा फट जाना एक सामान्य दुर्घटना है। सनातनी इसकी परवाह नहीं करते। मैल छुडाना सबके बूते की बात नहीं है। यह काम तो वही कर सकता है जिसके मन में अपने देश, अपनी जाति अपनी विरासत के संरक्षण-संवर्द्धन के लिए कुछ करने / कुछ भी करने  की ललक हो। सनातनी लोगो में यह ललक लबालब भरी हुई पायी जाती है।   
यही कारण है कि सनातनी आज अपने पुरखे-पुरनियों का कलंक धोने के लिए उद्यत उद्धत हैं। वे वे आज भी मर्माहत हैं कि एक गैर-सनातनी के कुकृत्य की वज़ह भक्त शिरोमणि तुलसीदास को कितना कलंकित जीवन जीना पड़ा था। राम के घर से ही उस गैर-सनातनी ने  राम को बाहर कर दिया। जहाँ कौशल्या रोज़ सुबह नन्हें राम को तेल मालिस करती थीं, वहां पर उसने मस्जिद बनवा दी। यानी सनातनी विरासत के मुंह पर तमाचा और माथे पर कलंक का टीका लगा दिया।   इस कलंक को धोने में तकरीबन 400 साल लग गए। क्यों? क्योंकि सनातनी एकजुट नहीं थे। लेकिन जब हुए तो कलंक को धो डाला.  
रही बात भूत और सनक उतारने की तो एक बात साफ है कि भूत और सनकी अब लुका-छिपी का खेल नहीं खेल सकेंगे। इस ओझा को सबकुछ मालूम है, इसका दिमाग भी दुरुस्त है और हाथ तो सु-अभ्यस्त हैं ही। याद कीजिये कि गुजरात में गैर-सनातनियों की सनक कैसे उतरी थी। अब तो वे भी वहां राम-राम करने लगे हैं। इस तरह प्रमाणित होता है कि मोदी ने क़र्ज़ के प्रत्यय को व्यापक अर्थों में इस्तेमाल किया है। 
अगर आपको यह सबकुछ चाहिए तो यकीन कीजिये कि आपके लिए मल्हार गाने का यही सही वक़्त है। अगर आपको यह सबकुछ नहीं चाहिए तो आपको दूसरी राह की खोज अभी और यहीं करनी होगी। सनातनी आतंक का यह नन्हा दानव उतना बड़ा है नहीं जितना बड़ा करके इसे दिखाया जा रहा है। लेकिन नन्हा दानव भी दानव है, इसे और खून मत चटाइये। इसके पहले कि यह सबकुछ 'सिया राम' कर दे, हमें मिलकर इस दानव का ही 'राम-राम सत्य' करना होगा। चुप मत रहिये। यकीन मानिए कि विवेक के सामने इसकी आँखें चुंधियाती हैं। तेज़ करो विवेक का रंदा और विमर्श करो जनता से अगर चाहते हो कि   ...     
 जय भारत! जय संविधान!!

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