Tuesday, January 6, 2015

एक बात मेरी भी: सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है वीरेन्द्र कुमार सिंह मैं ...

एक बात मेरी भी: सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है वीरेन्द्र कुमार सिंह मैं ...: सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है   वीरेन्द्र कुमार सिंह   मैं उनमें से नहीं हूँ जो  रूस और पूर्वी यूरप के देशों में समाजवादी सरकारों के पराभव म...

एक बात मेरी भी: Hopemay have been shattered, but certainly not lo...

एक बात मेरी भी:
Hopemay have been shattered, but certainly not lo...
: Hope may have been shattered, but certainly not lost Virendra Kumar Singh The most despicable crimes in the history of mankind, the...

एक बात मेरी भी: एक बात मेरी भी: End of ReligionVirendra Kumar Sing...

एक बात मेरी भी: एक बात मेरी भी: End of ReligionVirendra Kumar Sing...: एक बात मेरी भी: End of ReligionVirendra Kumar Singh What does r... : End of Religion Virendra Kumar Singh What does religious ...

एक बात मेरी भी: खाना, पीना', हगना, मूतनावीरेन्द्र कुमार सिंह  चा...

एक बात मेरी भी:
खाना, पीना', हगना, मूतनावीरेन्द्र कुमार सिंह  
चा...
: खाना , पीना ', हगना , मूतना वीरेन्द्र कुमार सिंह     चार पूरक व सहजीवी क्रियाएं। इनकी   निरंतरता ही   हमारे जिंदा होन...

एक बात मेरी भी: मिड डे मील और सरकारीस्कूल  मिड डे मील की खुराक से...

एक बात मेरी भी: मिड डे मील और सरकारीस्कूल 
मिड डे मील की खुराक से...
: मिड डे मील और सरकारी स्कूल   मिड डे मील की खुराक से   बिहार के सारण   जिले के मशरक प्रखंड में   अबतक 23 बच्चों की मौत हो चुकी है। कई...

एक बात मेरी भी: End of ReligionVirendra Kumar SinghWhat does r...

एक बात मेरी भी:
End of ReligionVirendra Kumar Singh


What does r...
: End of Religion Virendra Kumar Singh What does religious terrorism represent in the first place? We can provide a proper an...

Saturday, July 20, 2013

, अब लौट चलें …

वो भी क्या दिन थे जब हम  कंद-मूल खाकर नदी-निर्झर का पानी पी लेते थे और मस्त रहते थे। शीत व वर्षा से सुरक्षा के लिए कंदराएं थीं तो तपन से सुरक्षा के लिए तरुवर की शीतल छाया थी। तरुवर की छाया में हम विश्राम के साथ साथ प्रभु का गुणगान भी करते रहते थे। तब हमारी प्रकृति इतनी आध्यात्मिक हुआ करती थी कि राह चलते हमें ईश्वर के दर्शन हो जाते थे। शर्तिया मोक्ष का इससे बेहतर अवसर हमें किसी दूसरे युग में नसीब न हो सका। लेकिन ऐसा नसीब हमें मिलता भी तो कैसे? अध्यात्म की बगिया में आग भी तो हमीं ने लगाई थी; अब रोना तो पड़ेगा ही। हम अपना मूलाधार भूल गए और अज्ञानी-अंधा होकर थोथा के पीछे दौड़ते लगे। नतीजा सामने है। कलतक हम विश्व-गुरु थे लेकिन आज फिसड्डी बन गए हैं। कहाँ तो दुनिया आती थी हमारे आँगन में ज्ञान के मोती चुगने; कहाँ आज हम दुनिया से मनुहार कर रहे हैं कि 'हमका भी साथ ले ले।  रोना आता है कि हम क्या थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी।    

जहाँ दूसरे लोग सिर्फ खुली आँखों से दुनिया देख पाते थेवहीं हम बंद आँखों से ही पूरी दुनिया देख लेते थे। उनके पास सिर्फ दृष्टि थी तो हमारे पास दिव्यदृष्टि। उन्हें  सिर्फ सामने की दुनिया दीखती थी जबकि हम घटित के साथ साथ अघटित भी देख लेते थे। सच तो ये है कि अगर महाभारत के संजय की कारस्तानियों की मुक़म्मल जानकारी दुनिया को पहले से होती तो वह टेलीफोन व टी.वी. जैसे खिलौनों के आविष्कार पर इतना नहीं इतराती। इसे कर्म का  फेर नहीं तो और क्या कहेंगे कि आज इन्हीं खिलौनों में उलझकर हम अपने आप को आधुनिक कह रहे हैं। कौन नहीं जानता कि हमसे पहले किसी भी राष्ट्र को काल-चक्र व उसके प्रभावों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी? विकास में विनाश की झलक सबसे पहले हमें ही दिखाई पड़ी थी। सबसे पहले हमें ही पता चला था कि समय के साथ साथ हमारा दैहिक, दैविक और भौतिक ह्रास होता जायेगा और हम सतयुग से चलते हुए कलयुग में पहुँच जायेंगे।

आज हम हताश-निराश चारों खाने चित्त ज़मीन पर पड़े कराह रहे हैं। इस घोर विकट विपत्ति से हमें कौन निजात दिलाएगा? गुलामी को नियति माने बैठे जो लोग आज भी मलेच्छों व आक्रांताओं के तलुवे सहला रहे हैं, वे तो कतई नहीं। पाप का घड़ा भर चूका है, अब इसे फूटना ही होगा। आर्यावर्त की पावन धरा सदैव विकल नहीं बनी रहेगी क्योंकि कल्कि रूप में विष्णु भगवान का अवतार अब से लगभग 5-6 दशक पहले ही हो चूका है। गुजरात के किसी गरीब पिछड़ी जाति  के परिवार में जन्मे कल्कि भगवान नागपुर के गुरुकुल से शिक्षित-दीक्षित होकर कई सालों से मलेच्छों और उनके संगी-साथियों के खिलाफ अकेले लड़ते हुए फतह-दर-फतह हासिल किये जा रहे हैं। लेकिन विडम्बना देखिये कि मद-काम-लोभ से ग्रस्त भारत के दूसरे हिस्सों में रहनेवाले कुछ मूरख लोग आज भी इस अलौकिक आभा के सामने अपनी हेठी  बघारे जा रहे हैं।  लेकिन हम जानते हैं कि जब कंस, दुर्योधन और रावण की हेठी नहीं चली तो इनकी क्या चलेगी। तरस आता है यह जानकर कि कल जब ये कीट-पतंगों और पिल्लों की तरह कुचले जायेंगे तो  इनके लिए कोई अपने दो बूँद आंसू भी जाया नहीं करेगा। पातक कर्म की इति ऐसे ही होती है कि घर-परिवार में रहा न कोई रोवनहारा

तो अब तय है कि हम फिर से कलयुग से सतयुग में वापसी करेंगे। लेकिन इसके लिए देश को चुस्त और मुश्तैद होकर भगवत्स्वरूप मोदी के लोककारी व मोक्षकारी कार्यक्रमों को अमली जामा पहनाना होगा। मोदी रचित नव- गीता के तीन सूत्रीय कार्यक्रम निम्नांकित हैं:

1. गायत्री मंत्र में बिद्ध परमाण्विक सिद्धांतो / सूत्रों के आधार पर पुरे देश में परमाणु-संयत्र स्थापित करना
इस संयत्र में धातु की चादर की ज़गह मंत्र-पूत चन्दन की लकड़ी का उपयोग किया जायेगा। यह विकल्प संयत्र को पवित्र भी बनाये रखेगा और मज़बूत भी। संयत्र की चंदनी दीवारों पर साप्ताहिक रूप से गोबर का लेप चढ़ाया जायेगा ताकि संयत्र में प्रशीतन का काम सतत रूप से चलता रहे। इस प्रक्रिया के अनुपालन से हम पश्चिमीकरण से कन्नी काटते हुए सीधे आधुनिक हो जायेंगे।

2. देशज शिक्षा को पुनर्स्थापित करना
इसके लिए मदरसों तथा सरकारी और निजी स्कूलों की ज़गह  गुरुकुल स्थापित किये जायेंगे जिसमें सिर्फ बाभन-ठाकुर के लडके ही पढ़ सकेंगे। स्त्री व दलित शिक्षा को धर्म-विरोधी करार दिया जायेगा।अलबत्ता, उनके लिए पेशवर शिक्षा की व्यवस्था ज़रूर की जा सकती है। स्त्री शिक्षा के लिए स्कूल-कॉलेज की ज़रूरत नहीं होगी क्योंकि उनके लिए ज़रूरी संस्कारगत आचरण व मर्यादा की शिक्षा परिवार के अन्दर ही उपलब्ध रहेगी। सभी छात्रों के लिए धोती व जनेऊ पहनना तथा चुटिया रखना अनिवार्य होगा। शिक्षक का दायित्व भारतीय संस्कृति के सजग प्रहरी साधुसंत करेंगे। पाठ्यक्रम का निर्धारण नागपुर में स्थित ज्ञान-कुल के नामी-गिरामी हिन्दू राष्ट्रवादी करेंगे।

3   हिन्दू राष्ट्रवाद की स्थापना करना

जब भारत में मलेच्छ व ईसाई नहीं थे तो यह देश ज्ञान-विज्ञानं के क्षेत्र में दुनिया में अव्वल था। हम कंडे की चाबुक को मिसाइल बना लेते थे और उसे धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ाकर लांच कर लेते थे। एक ही पुष्पक विमान पर सवार होकर सभी देशवासी दूर देश की यात्रा कर आते थे फिर भी उसमें एक सीट खाली रहती थी। ऐसा इसलिए संभव हो पाया था कि हमारे संत-मुनि एक ऐसे धातु की खोज कर सके थे जिसके प्रत्यास्थता गुणांक का मान असीम होता था। ऐसे धातु से बना मशीन असीम लचीला होता है जिसे चाहत के हिसाब से बढाया जा सकता है।    खैर, चिंता की कोई बात नहीं है। हम अब से भी सजग हो गए तो सबकुछ ठीक हो जायेगा। इसके लिए हमें अपने विचार, संस्कार व व्यवहार में आमूल-चूल परिवर्तन लेन होंगे।  सबसे पहले सभी नागरिकों के लिए अनिवार्य होगा कि वे अपने घर की दीवारों पर स्वस्तिक उकेरें; स्नान-ध्यानादि के पश्चात सूर्य नमस्कार करें; गाय और राष्ट्र को माता मानें; संतो-योगियों-मुनियों के प्रति मन में असीम श्रद्धा का भाव रखें; वैदिक धर्म की रक्षा में हिंसा करने से भी गुरेज़ न करें।  भारतीय संस्कृति के दामन पर लगे अशेष दागों को अविलम्ब हटायें तथा नियमित रूप से हवन का आयोजन कर पर्यावरण को दूषित होने से बचाएं। धर्म-सत्ता समय-समय पर और भी अनुदेश जारी करती रहेगी जिसका अक्षरशः अनुपालन अनिवार्य होगा।

Friday, July 19, 2013

मिड डे मील और सरकारी स्कूल 

मिड डे मील की खुराक से बिहार के सारण जिले के मशरक प्रखंड में अबतक 23 बच्चों की मौत हो चुकी है। कई अभी भी मौत को मात देने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सबको मालूम है कि आज सरकारी स्कूलों में पढ़ने कौन जाता है! सिर्फ दलित और अति पिछड़ी जातियों के बच्चे जाते हैं। इक्का-दुक्का सवर्ण बच्चा आ जाता हो तो अलग बात है। अगर आपका बच्चा सरकारी प्राइमरी स्कूल में पढ़  रहा है तो आपको यह बताने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए कि आपमें सिर्फ जिंदा रह सकने भर की सामर्थ्य है। आलम आज ये है कि मिड डे मील की योजना बंद हो जाये तो ये सरकारी  स्कुल भी बंद हो जायेंगे। प्राइमरी शिक्षा के क्षेत्र में काम करनेवाले जानते हैं कि इन  स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति भी मिड डे मील के वितरण के समय दर्ज की जाती है। ऐसा लगता है जैसे सरकारी प्राइमरी स्कूलों के ज़रिये  शिक्षा के क्षेत्र में अछूतीकरण को संस्थागत स्वरुप प्रदान करने की कोशिश की जा रही है। इन स्कूलों को देखकर डर लगता है।

क्या आप जानते हैं कि सरकारी स्कूलों में मध्याह्न भोजन क्या बनता है, कैसे बनता है? मैं बात सिर्फ भोजन की नहीं कर रहा हूँ, मेरी नज़र में तो यह पूरा  सरकारी स्कूल-तंत्र और उससे जुड़ा  महकमा है। सरकरी  स्कूलों का  पूरा माहौल ऐसा बन चूका है जहाँ सिर्फ थकान है; मरे हुए सपने हैं और सांसों पर ज़लालत की लेप है। ऐसे में क्या आप मान सकते हैं ये  स्कूल छात्रों में कोई मुक्तिकारी चेतना विकसित  कर सकेंगे ? शिक्षा का एक उद्देश्य मुक्ति देना भी तो है! सा विद्या वा विमुक्तये। मुझे तो ऐसा नहीं लगता। उल्टे , मुझे यह  लगता है कि  नए अछूत बनाने के कारखाने बन गए हैं ये स्कूल! सामाजिक विषमता की बीभत्स तस्वीर। स्कूलों की असमानता एक तरह से इस बात की गारंटी भी है कि हम और हमारा समाज समानता की बात से आज भी यौगिक तटस्थता बनाये रखना चाहते हैं। बात भले ही जनतंत्र की हो रही हो या कि समाजवाद की, हम बराबर की आंख से नहीं देख पाते। हम जन्मजात अईंचा / काना हैं। मुझे बरबस गोरख पाण्डेय की मशहूर कविता 'समाजवाद बबुआ ...' की चंद पंक्तियाँ याद  आ रही हैं।  सरकारी और निजी स्कूलों के दृश्य आँखों के सामने रखकर सोचता हूँ तब याद आता है: बड़का के बड़हन, छोटका के छोटहन / बखर बराबर बंटाई, समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई 

जो लोग स्कूली बच्चों की  मौत को  हादसा मान रहे हैं, उनकी नीयत में मुझे खोट दीखती है। ये लोग  अपनी सुविधा से विस्मरण आसन करने में अभ्यस्त व सिद्धहस्त हैं। सभी एक दूसरे को अन्दर तक जानते हैं, इसीलिए सब चुप हैं। सत्ता के खेल में शामिल सभी चुप हैं: पक्ष भी विपक्ष भी।  कोई इसे हादसा कह रहा है तो कोई साज़िश तो कोई  सुनियोजित शिशु-बध। कोई कुछ भी कहे, क्या फर्क पड़ता है? यह किसी एक सरकार की विफलता नहीं है। जीतनी बड़ी विफलता यह नीतीश कुमार की है उतनी ही हमारी पूरी राजनीतिक-व्यवस्था  की भी है।  नीतीश की इसलिए कि उनसे यह उम्मीद नहीं थी कि उनकी सरकार दलित, महादलित व अति-पिछड़े तबके के प्रति इतनी उदासीन हो सकती है। उनकी राजनीति के यही मूलाधार रहे हैं। खैर, पूंजीवादी लोकतंत्र में नेता की कथनी-करनी में अंतर न हो तो ही अजब। कुछ हद तक मुझे नीतीश, लालू, मोदी (सुशील) और कांग्रेस की उदासीनता समझ आती हैकिन्तु  दलित नायकों / नायिकाओं / बुद्धिजीवियों की चुप्पी समझ से परे लगती है। अगर दलित समाज भी सरकारी  शिक्षा-प्रबंधन के प्रति उदासीन हो गया तो जान लीजिये कि यह तबका फिर किसी दूसरे संसाधन के ज़रिये शिक्षित नहीं हो सकता। निजी शिक्षा बहुलांश दलित समाज के  लिए आज भी दूर की कौड़ी है। जिस समाज के बच्चे सिर्फ भोजन के लिए स्कूल जाते हों, उस समाज को यह तो तय करना ही होगा कि वह अपने बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या करने जा रहा है? जिस तरह मिड डे मील गरीब बच्चों का हक है, उसी तरह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी उनका हक है। इसीलिए शिक्षा सुधार के प्रयासों में  दलित की भागीदारी और अगुवाई दोनों की अपेक्षा की जाती है।   


एक बात और। इस हादसे के बाद यह स्वीकार करने में किसी को कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि भ्रष्टाचार गरीबों के लिए जानलेवा है। भ्रष्टाचार के मुद्दे को सिर्फ आर्थिक अपराध मानना गरीबों के साथ क्रूर मजाक है। हमें इसकी परिभाषा बदलनी पड़ेगी और इसकी सजा भी। भारत का गरीब भ्रष्टाचार के अत्याचार को अब और नहीं बर्दाश्त कर सकता।    

Sunday, April 28, 2013

मतलब निकल गया है तो ...


जिस व्यक्ति ने आपके कन्धों पर खड़े होकर फलक की ऊंचाई और विस्तार का आभास पाया हो, वही व्यक्ति अगर आज आपकी बांह मरोड़ने लगे  तो आपको कैसा लगेगा? जीवन में ऐसी विकट घडी और ऐसे दुर्जन से हर सज्जन व्यक्ति को कभी न कभी दो-चार होना पड़ता है। पुराने ज़माने में भी ऐसा होता था। मुहावरे गवाह हैं। पीठ में छुरा मारना, सांप को दूध पिलाना - कुछ ऐसे मुहावरे हैं जिनका हवाला देकर हमें बचपन से बताया जाता रहा है कि आँख मूंदकर सब पर भरोसा नहीं करना चाहिए। क्या पता कौन, कब और कहाँ आस्तीन का सांप बन आपको डंस ले। आपका दुःख तब और भी विकराल हो जाता है जब आपको पता चलता है कि आपके जीवन की इस उलटबांसी का सूत्रधार आपका खासम -ख़ास है। वह आपका भाई, आपका साथी, कोई भी हो सकता है। त्रिकालदर्शी साधक-संत बता गए हैं कि कलयुग में  व्यतिक्रम  की ऐसी घटनाएं बाढ़ की तरह  बढ़ती जाएँगी। सतयुग में भी ऐसा हो चूका है और त्रेता में भी। 

लेकिन जो नितीश ने मोदी के साथ किया वह सबसे अलग और सबसे निकृष्ट है। जिस दोस्ती की बदौलत नीतीश सत्ता में आये आज उसी का उपहास उड़ा रहे हैं। आज से करीब  दस साल पहले बिहार प्रान्त पर, कहते हैं, कि दानवों का क़ब्ज़ा था। जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। तामसी प्रवृति का बोलबाला था। रोज़ कहीं आग लग जाती थी कहीं गोली चल जाती थी। बिहार की जनता त्राण के लिए गुहार लगा रही थी, लेकिन कहीं कोई देवदूत या अवतारी  नज़र नहीं आ रहा था।यही वह समय था जब भाजपा ने  नीतीश के लिए दोस्ती का पैगाम  भेजा  था। राम की छत्रछाया में जिस तरह विभीषण राज्यारूढ़ हुए थे, ठीक उसी तरह भाजपा की कृपा से नीतीश बिहार के मुख्यमंत्री बने थे।लेकिन भाजपा की इस नेकी के बदले नीतीश आज क्या दे रहे हैं भाजपा को? आज जब कांग्रेसी राक्षस के बध का वक़्त आया है, नीतीश दोस्ती का दामन छोड़ने पर आमादा हैं और कह रहे हैं कि भाजपा से उन्हें कोई परहेज़ नहीं है, परहेज़ है तो सिर्फ मोदी से। यह अजीब सी बात है। अगर भाजपा सेना है तो मोदी उस सेना के सेनापति। अगर नीतीश को सैन्य सहायता चाहिए तो सेनापति की मंज़ूरी तो लेनी ही पड़ेगी! किसी और के कहने से ज़ेबक़तरे भी अपना नेता नहीं बदलते, तो फिर भाजपा क्यों बदल दे? मोदी और उनका कुनबा जानता है कि ऐसी बेवकूफी उसे कहीं का भी नहीं छोड़ेगी। भाजपा युद्ध में सेनापति के बगैर नहीं जाना चाहेगी क्योंकि ऐसा करना उसके लिए युद्ध से पहले ही हार की स्वीकृति होगी। 

नीतीश को जाननेवाले बताते हैं कि वे आदिकालीन कूटनीतिज्ञ चाणक्य के अवतार हैं। मैकिआवेली से बहुत पहले ही चाणक्य ने बता दिया था कि राजनीति में दुश्मन का पूर्ण सफाया  ही सच्चे राजनीतिज्ञ का लक्ष्य होना चाहिए। सो, नीतीश की मंशा भी आज यही लग रही  है। जब तय है कि कांगेसी राक्षस का बध हारे-थके योद्धा नहीं कर पाएंगे तो फिर नीतीश की इस जिद्द के मानी क्या हैं? पूरा संसार जानता है कि  मोदी ने महाभारत के अर्जुन की तरह कांग्रेसी कौरवों की व्यूह-रचना बार-बार ध्वस्त की है; कि उनकी सैन्य-रणनीति बेमिसाल है। ऐसे में नीतीश का हठ आम आदमी की समझ से परे है। खैर, जो जैसा करेगा, वैसा ही भरेगा भी।  लेकिन, मोदी और उनके कुनबे के लोग जानते हैं कि कसाई के सरापे गोरु नहीं मरते। खैर, ये तो आतंरिक शक्ति की बात है, लेकिन इस बात का मलाल तो भाजपा को रहेगा ही कि 'मतलब निकल गया है तो पहचानते नहीं'। आपको क्या लगता है कि मोदी परिवार के लिए दुःख की घडी आ गई है? बिलकुल नहीं, मोदी परिवार को नीतीश के नैतिक विचलन पर अफशोष है, दुःख नहीं।  दुःख का कोई कारन भी नहीं है क्योंकि मोदी को जनता ने अपना हीरो मान लिया है। अब बादल फटे कि वज्र गिरे, जनता का संकल्प डिगेगा नहीं। 

जनता ने तय कर लिया है कि 2014 के चुनावों में वह क्या करने जा रही है।  नीतीश को मुगालता है कि वे किंगमेकर की भूमिका में आ गए हैं। कुएं का मेढक कितना भी टर्र -टर्र करे समुद्र के विस्तार और गहराई का आभास नहीं पा सकता। कुएं का मेढक राजनीति की बहुरिया  का ऐसा पिया नहीं होता कि वह उसे मनाने के लिए रोये, धोये और मनुहार करे। मोदी नव भारत की नवेली दुल्हन की तरह हैं। उनके रूप-रंग का ज़लवा ऐसा है कि एक बुलाये, सौ-सौ धाये। एक प्रेमी रूठा तो कई लाईन में खड़े हैं। बाहर अमरीका से भी रिश्ता आया है। देशी धनकुबेर अलग से पलक-पाँवरे  बिछाए बैठे है। एक नीतीश गए तो कई आये भी।  देश ही नहीं विदेश से भी। सुपरपावर अमरीका के प्रतिनिधि आये और मोदी से मिलकर भाव-विभोर हो गए। जहाँ नीतीश को बिहार के बाहर इक्के-दुक्के लोग जानते हैं, वहीं मोदी के विकास-मॉडल की चर्चा दुनिया-जहाँ में हो रही है। लेकिन ईर्ष्या में अंधे बने नीतीश को कुछ नहीं दीख रहा। वे अपनी डफली पीट रहे हैं कि बिहार का विकास-मॉडल ही असली मॉडल है। गुजरात में जो विकास हुंकार रहा है वह धोखा है; कि उस विकास से सबका फ़ायदा नहीं हुआ है; कि वह विकास  समुद्र किनारे बसे होने की वज़ह से है; कि उसमें नफ़रत की बू है और यह कि उसके दामन पर खून के छींटे हैं। जिस विकास की चकाचौंध से दुनिया की आँखें चुंधिया गई हों, वह नीतीश को दिखाई भी नहीं पड़ रही है। विनाशकाले विपरीत बुद्धि!   

सबकुछ सही चल रहा था। दुश्मन हताश था, नए महाराज गुजरात में नूतन राजनीति शास्त्र में अपरेंटिसशीप पूरी कर दिल्ली में दस्तक दे चुके थे; नए-नए दोस्त दरबार लगाने लगे थे; अश्वमेध यज्ञ के लिए अमिधा की लकड़ी मंगा ली गई थी; पुरोहित नहा -धोकर यज्ञस्थल की ओर कूच कर चुके थे, अश्वमेध का घोडा  चारों दिशाओं के छोर छूकर  लौटनेवाला ही था कि बीच रास्ते में नीतीश ने घोड़े की लगाम पकड़ ली। पीठ में छुरा भोंक दिया। ऐसा दर्द दे दिया जैसा किसी ने कभी न दिया था। लेकिन नीतीश भूल गए कि असली शक्तिमान जब अपनी असली शक्ति का प्रदर्शन करेगा तो कहीं कुछ न बचेगा। समुद्र राज ने भी त्रेता में राम से ऐसी ठिठोली करने की कोशिश की थी। उसका क्या हश्र हुआ, हम सभी सनातनी जानते है। जो कुछ देर पहले माथे पर मूतने की कोशिश कर रहा था, वही भू-लूंठित होकर अपने प्राणों की भीख माँगने लगा था। खैर, दुर्जन चाहे जितना जोर लगा ले, सज्जन का बाल बांका भी नहीं हो सकता।  

आज नीतीश सिद्धांतवादी हो गए हैं। कहते फिर रहे हैं कि धर्म-निरपेक्षता के लिए अपनी राजगद्दी भी दाँव पर लगा देंगे। आज उनके लिए राजधर्म सनातन-धर्म से बड़ा हो गया। झूठ की भी कोई सीमा होती है।  संविधान में मोदी की भी आस्था है और वे भी संविधान की ही शपथ लेकर मुख्यमंत्री बने हैं। जनता का ऐसा भीषण समर्थन गुजरात में किसी और नेता को कभी नहीं मिला  तो इसीलिए कि दूसरे जहाँ कुर्सी-कानून से आगे नहीं बढ़ पाए, वहीं मोदी ने राजनीति का इस्तेमाल समाज को पुनर्जीवित करने के लिए किया: सदियों से सनातनी चेहरे पर चस्पां कलंक धोया, खोये हुए जातीय सम्मान की रक्षा की  तथा  सनकियों की सनक उतारकर समाज में सदाचार और सद्भाव को बढ़ावा दिया। और सबसे बड़ा काम ये किया कि टुकड़ों में बंटे सनातनी समाज को एकात्म मानववाद के सूत्र में पिरोकर एक किया। नीतीश ने क्या किया बिहार में? बिहार आज जंगल राज से निकल पाया है तो मोदी परिवार के सहयोग से ही। मोदी परिवार के नन्हे-नन्हे बच्चे गली गली घूमकर अलख जगाते रहे तब जाकर बिहार से जंगल-राज ख़त्म हुआ था। लेकिन, नीतीश अब पूरा प्रसाद अकेले खाने के चक्कर में हैं। लेकिन बिहार की जनता जानती है कि नीतीश ने समाज को किस तरह टुकडे -तुकडे में बाँट रखा है। गरीबों में सबसे गरीब, पिछड़ों में सबसे पिछड़ा खोजने के बहाने नीतीश अंग्रेजों की 'फूट डालो, राज करो' की नीति को लागू करते रहे हैं।  बौरा गए हैं नीतीश।  

लोकतंत्र में जनता ही परमेश्वर होती है। नीतीश की चालाकी और अवसरवादिता से जनता वाकिफ हो चुकी है। अब वह घास नहीं डालनेवाली। अब तो जनता घास डालेगी तो सिर्फ मोदी को। जनता जान चुकी है कि विकास का मंत्र सिर्फ मोदी के पास है। लेकिन विकास के लिए शांति भी ज़रूरी है और मोदी जानते हैं कि शांति-पाठ का ककहरा और मीमांसाशास्त्र क्या है। जैसे गुजरात शांत हुआ वैसे ही पूरा देश भी शांत होगा। मोदी दोगलेपन से परहेज़ करते है और नफ़रत भी। उनका कुनबा मानता है कि जब तक एक देश में एक कानून, एक धर्म, एक नेता और एक दल को कानूनी मान्यता नहीं मिलेगी तबतक न तो अमन कायम होगा और न ही विकास परवान चढ़ेगा। ढृढ़-निश्चयी मोदी समतलीकरण में विश्वास करते हैं; अनेकता में एकता की बात को खोखली मानते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि बहुरंगी वस्त्र-धारण कर कोई संत-गुनी-मुनि नहीं बनता। सबके लिए एक रंग, सबके लिए एक लक्ष्य के सिद्धांत पर अमल करके ही देश में शांति और विकास की गंगा बहाई जा सकती है।

भारत में भगवा रंग अनादि काल से सद्बुद्धिकारी रहा है। यह रंग हृदय को निष्कलुष बनाता और चित्त को पावन। सिर्फ कुछ सनकी लोगों को खुश करने की गरज से इस सनातनी रंग की अबतक अनदेखी होती रही। नतीजा सामने है: भारत का राष्ट्रीय ध्वज एकरंगा न होकर तिरंगा है। भगवा रंग संपूर्ण सत्य की ज़गह तिहाई सत्य का द्योतक बना दिया गया। संविधान में सनातन धर्म को कोई प्रतिष्ठा नहीं दी गई। और तो और, सनातनियों के जले पर नमक छिड़कने के लिए राज्य को धर्म-निरपेक्ष घोषित कर दिया गया। लेकिन अब देश जाग चूका है; उसे उसका नायक मिल चुका है। यानी, उदित उदयगिरि मंच पर मोदी का अवतरण हो चुका है; अब खलों की खैर नहीं, अब वे कीट-पतंगों की तरह जल-मर जायेंगे। रास्ता साफ है: या तो मोदी को गद्दी पर बिठाओ या खुद ही मिट जाओ। तय आपको करना है कि आपको क्या चाहिए। आप ऐसा न मानें कि मोदी गद्दी पर बैठकर भी आपको मिटाने का काम करते रहेंगे। अलबत्ता, उनके विरोधी साजिशन अभी भी रहीम कवि के दोहे गुनगुनाये जा रहे हैं कि:

"रहीमन ओछे नरन सों, बैर भली ना प्रीत।
काटे चाटे स्वान के, द्विभान्ति विपरीत।'   

Saturday, April 13, 2013


खाना, पीना', हगना, मूतना
वीरेन्द्र कुमार सिंह  

चार पूरक सहजीवी क्रियाएं। इनकी निरंतरता ही हमारे जिंदा होने का सबब और सुबूत हैं।  इनमें से प्रथम दो क्रियाएं जहाँ आगत क्रियाएं हैं वहीं अंतिम दो निर्गत। हम अपने घरेलु संस्कारवश आगत का स्वागत और निर्गत का  विकार के रूप में तिरस्कार करते रहे हैं। कुछ लोग मानते हैं कि आगत निर्गत की क्रियाएं द्वैतवाद के सिद्धांत का अनुपालन करती हैं तो कुछ मानते हैं कि अद्वैतवाद का। लेकिन इस ज्ञान-मीमांसा का ज्यादा असर आम आदमी पर हुआ प्रतीत नहीं होता। आम आदमी की आस्था निर्गत में ज्यादा दीखती है। वह निर्गत के आधार पर ही आपके स्वास्थ्य की मुक़म्मल जानकारी पा  लेता है। डाक्टर-वैद्य भी निर्गत के आधार पर ही अपना नुस्खा अग्रसारित (recommend)  करते हैं। 

कोई आपसे आपके तबीयत के बारे में पूछे और आप कहें कि ठीक है किन्तुवह तपाक से पूछ बैठेगा - पेशाब-पैखाना तो नियमित है ? कोई मानसिक परेशानी चेहरे पर चस्पां हो तो आत्मीय जन जान लेंगे कि आप सुबह में ठीक से फारिग नहीं हो पाए होंगे। मुझे अबतक के जीवन में कोई ऐसा नहीं मिला जो यह जानता हो कि सुबह में आसानी से फारिग होने के उपचार क्या हैं? कल एक मित्र से यूँ ही तफरी में कुछ तफरी की बातें हो रही थीं कि अचानक वे मेरी निजी आदतों के बारे में जानकारी माँगने लगे। 

'सुबह जगने पर आप पहला काम क्या करते हैं?'  
'भई, जगते ही कौन काम रता है कि मैं करूँ?' मैंने कहा।

उन्होनें इसे मेरा मजाकिया अंदाज़ माना और अपनी सलाह-सरिता को बहते रहने दिया। 'मित्र मैं तो एक छोटी-सी सलाह दे रहा हूँ।कुछ और करें या नहीं करें, एक काम करना कभी भूलियेगा। कोई भी परिस्थिति हो, सुबह जगने के तुरंत बाद मिटटी के घड़े का एक लोटा शीतल जल सेवन  कीजिये, घर में डाक्टर-वैद्य की ज़रूरत कभी नहीं पड़ेगी।'

'सो कैसे?' मैंने पूछा।

मेरे सवाल सुनकर वे प्रोत्साहित हो उठे। कहने लगे, " बाहर की गन्दगी हो या भीतर की, बिना आग और पानी के दूर नहीं हो सकती। आग और पानी के बगैर तो मंत्र भी प्रभावी नहीं रह जाते। यही karan है कि मंत्र जाप के साथ साथ पुजारी या तो आग की आरती करता है या जल का छिड़काव। सुबह पानी पीने से शरीर में जमी रात भर की गन्दगी पेशाब के साथ निर्गत हो जाती है और शौच को पुनार्सिंचित कर गाढ़े तरल पदार्थ में तब्दील कर देता है। गन्दगी के सफल निर्गम के बाद आपका शारीर फिर से तरोताजा हो जाता है और दुगुने वेग से क्रियाशील हो उठते हैं।‘ वे कहे जा रहे थे कि मैंने टोका।  

'यार, बात क्या थी और तुम कहाँ पहुँच गए?' मैंने मिन्नत की तरह अपना प्रतिवाद जताया। 

झेंपने की जगह मेरे प्रतिवाद की बात सुनकर वे तटस्थ हो गए।  बकने लगे, " सुखदायी निवृति के पश्चात मन भी निष्कलुष हो उठता है। लेकिन सोच को सुखद बनाने के लिए पानी पीना ज़रूरी है।पेट के अन्दर पहुंचकर पानी ही वह केंद्रीय दबाव पैदा करता है जिसकी वज़ह से निर्गत की क्रिया संचालित होती है। फिर तुम यह भी जानते हो कि निष्कलुष मन में ही ईश्वर का वास होता है। जानता हूँ कि तुम नास्तिक हो, लेकिन सुबह-सुबह जब तुम्हारे मन-मस्तिष्क-हृदय-आत्मा के आँगन में सुखद शौच के फलस्वरूप शुचिता के अनगिन मनिरत्न पवित्र आलोक फैला  रहे हों, तब दो मिनट के लिए परम पिता परमेश्वर को याद कर लेने में क्या हर्ज़ है?’

'अबे, तुम मुझे नास्तिक समझते हो कि चूतिया? क्यों याद करूँ तुम्हारे परम पिता परमेश्वर को? तुम अपने मन में अपने ईश्वर को आश्रय दो, लेकिन मेरे मन में कोई भी जगह खाली नहीं है तुम्हारे ईश्वर के लिए। तुम्हें कोई और काम है या नहीं? बिन पूछे सलाह देने की नौकरी तो नहीं दे दी किसी ने तुम्हें? अगर नहीं तो फिर क्यों एक ही झटके में शौच से शुरू होकर सुरपुर तक की यात्रा कर डाली? अरे, अपने भगवान को संडास तक तो मत घसीटो!' मैं खीझ में कुछ से कुछ बक गया। सोच रहा था कि कहीं वे बुरा मान जायें! लेकिन मित्र हो तो ऐसा जो अपनी बुराई भी निर्मल मन से सुने। 

उनका चितवन चित्त ज़रा भी मलिन हुआ। उल्टे, वे सर्वज्ञ हो गए और बांचने लगे, “'तुम जो भी कहो, सच यही है कि भगवान हर ज़गह है। संडास में भी। मैं तो यह कहता हूँ कि प्रत्येक प्राणी के जीवन के विधान का अनुपालन उसकी उपस्थिति और सीधी देखरेख में संभव होता है। वह खाने, पीने,  मुतने हगने में हमारी मदद करता है। जहाँ वो नहीं है वहां कुछ भी नहीं है।' यह उसाकी अंतिम दहाड़ थी।

मैं निरुत्तर हो गया। उसने मेरे संडास में प्रभु की मूर्ति स्थापित कर दी थी। मैं जान गया कि यह ईश्वर नामक जंतु अजर-अमर क्यों है। आकाश, धरती और पाताल तक की आबोहवा में उसके जीने की परिस्तितियाँ मौजूद हैं। लेकिन एक बात अब भी मन में ab bhi तबाही मचाते रहती है। वो ये कि  अगर ईश्वर सबके बगैर जी सकता है, तो मनुष्य के बगैर जीकर दिखाए? किसी और प्राणी ने तो घास डाला  नहीं? ले दे के सबसे बड़े उज़बुक हमीं रहे। अपनी बुद्धि को मिटटी का लोंदा बनाकर लोंदे की ही पूजा करने रहे। अगली बार यह मित्र फिर आया तो कहूँगा कि जा जहाँ ठूँसनी है, ठूंस ले अपने ईश्वर को, लेकिन मुझसे ऐसी ऊल-ज़लूल बातें मत किया करो। मैं तुम्हारे मानस-पुत्र का कोई अस्तित्व नहीं मानता। सुबह में पानी पीऊंगा, लेकिन प्रार्थना नहीं करूँगा और ही फ्रीज़ बेचकर मिटटी का घड़ा खरीदूंगा। आओ, देखो और ढूंढो कि मेरे  शौच में तुंहारा ईश्वर कहाँ छुपा बैठा  है। मैंने तुन्हारे मानस-पुत्र की मूर्ति संडास से हटवा दी है।