सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है
वीरेन्द्र कुमार सिंह
मैं उनमें से नहीं हूँ जो रूस और पूर्वी यूरप के देशों में समाजवादी सरकारों के पराभव में समाजवाद के सपने का भी पराभव देखते हैं। दरअसल मैं उन्हें वैचारिक रूप से नादान मानता हूँ। एक प्रहसनकारी सच ये भी है कि पूरा पूंजीवाद आज भी मार्क्स की मृतात्मा से लगातार संघर्ष कर रहा है। यही उसकी नियति है। इसके लिए पूँजीवाद अभिशप्त है। पूंजीवाद जानता है कि उसका असली दुश्मन कौन है। कौन है जिसे वह किसी भी रूप में, कहीं भी नहीं देखना चाहता? कुल ज़मा सत्तर साल में समाजवाद का ढहा जाना कोई हंसी खेल की बात तो है नहीं? साम्यवादी डिक्टेटरों ने मानवीय यातना की वीभत्स मिसालें कायम की हैं, इसका भी सर्वत्र वर्णन है ही। लेकिन मेरे लिए समाजवाद का विचार और उसकी संभाव्यता आज भी रोमांच पैदा करती है। क्या करूँ?समाजवाद के नाम पर सत्ता हासिल करना एक बात है जबकि समाजवाद के सपने को राजनीति, संस्कृति व समाज के स्तर पर अमली जाम पहनाना बिलकुल दूसरी। सत्ता अपने आप में विषमता का श्रोत है, ठीक उसी तरह जैसे उतपादन के संसाधन और / अथवा निजी पूँजी। वर्गविहीन और राज्यविहीन समाज की स्थापना की बात में भी यही निहित है. कहाँ तो तय था कि धीरे-धीरे राज्य और वर्ग की संस्थाएं घुलती जाएँगी और एक दिन बिल जाएँगी। कानूनी रूप से साम्यवादी देशों में निजी सम्पति की संस्था को निर्मूल कर दिया गया किन्तु सत्ता के केन्द्रीकरण के रूप राज्य अति-बलशाली हो उठा।
अरसा हुआ जब मैंने मान लिया था कि रूस समाजवादी देश नहीं है; बाद में देंग जिया पेंग के सत्ता में आने पर चीन को भी उस सूचि से बाहर कर दिया। नतीजतन, भारत की संसदीय कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी मेरे मन को कहीं से भी नहीं छु पायीं। वैचारिक सहानुभूति नक्सलवाद के आरंभिक रूप से भी रही; लेकिन अब किसी से नहीं है। तो भी मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि भारत की संसदीय कम्युनिस्ट पार्टियाँ बेहतरीन बुर्जुआ पार्टियाँ हैं। घोटालों के चौतरफा काले घटाटोप के बीच भी किसी कम्युनिस्ट नेता का नाम न उछाला जाना कोई कम बात नहीं है। ऐसी नैतिकता बुर्जुआ राज्यसत्ता को बहुत सुहाती है। नौकर अथवा प्रबंधन को ईमानदार होना ही चाहिए। बेईमानी सिर्फ मालिक कर सकता है। अलबत्ता, ईमानदारी के बदले बुर्जुआ समाज में यशलाभ का सुख संभव माना गया है।
लेकिन समाजवाद का सपना अभी भी लुभाता है। फिर, मार्क्स ने जिस तरह पूंजीवाद का विश्लेषण किया है, खासकर उसके सावधिक संकटों की अनिवार्यता उसके दुष्परिणामों का, उससे विश्वास और भरोसा आज भी है कि वो सुबह कभी तो आएगी। पूर्ण मनुष्य होना स्वर व साज़ है, जीवन का सार और संगीत है। और सबसे बढ़कर बात है कि यह सहज सरल संभाव्य भी है।
समाजवाद बबुआ केही विधि आई?
समाजवाद बबुआ केही विधि आई?
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