मिड डे मील और सरकारी
स्कूल
मिड डे मील की खुराक से बिहार के सारण जिले के मशरक प्रखंड में अबतक 23 बच्चों की मौत हो चुकी है। कई अभी भी मौत को मात देने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सबको मालूम है कि आज सरकारी स्कूलों में पढ़ने कौन जाता है! सिर्फ दलित और अति पिछड़ी जातियों के बच्चे जाते हैं। इक्का-दुक्का सवर्ण बच्चा आ जाता हो तो अलग
बात है। अगर आपका बच्चा सरकारी प्राइमरी स्कूल में पढ़ रहा है तो आपको यह बताने की ज़रूरत नहीं
होनी चाहिए कि आपमें सिर्फ जिंदा रह सकने भर की सामर्थ्य है। आलम आज ये है कि मिड डे
मील की योजना बंद हो जाये तो ये सरकारी स्कुल भी बंद हो जायेंगे। प्राइमरी
शिक्षा के क्षेत्र में काम करनेवाले जानते हैं कि इन स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति भी मिड डे मील के वितरण के समय दर्ज की जाती
है। ऐसा लगता है जैसे सरकारी प्राइमरी स्कूलों के ज़रिये
शिक्षा के क्षेत्र में अछूतीकरण को संस्थागत स्वरुप प्रदान करने की कोशिश की
जा रही है। इन स्कूलों को देखकर डर लगता है।
क्या आप जानते हैं
कि सरकारी स्कूलों में मध्याह्न भोजन क्या बनता है, कैसे बनता है? मैं बात सिर्फ भोजन
की नहीं कर रहा हूँ, मेरी नज़र में तो यह पूरा सरकारी स्कूल-तंत्र और उससे जुड़ा महकमा है। सरकरी
स्कूलों का पूरा माहौल ऐसा बन चूका है जहाँ सिर्फ थकान है; मरे हुए सपने हैं और सांसों पर ज़लालत की
लेप है। ऐसे में क्या आप मान सकते हैं ये स्कूल छात्रों में कोई मुक्तिकारी चेतना विकसित कर सकेंगे ? शिक्षा का एक उद्देश्य मुक्ति देना भी तो है! सा विद्या वा
विमुक्तये। मुझे तो ऐसा नहीं लगता। उल्टे , मुझे यह लगता है कि नए अछूत बनाने के
कारखाने बन गए हैं ये स्कूल! सामाजिक
विषमता की बीभत्स तस्वीर। स्कूलों की असमानता एक तरह से इस बात की गारंटी भी है कि
हम और हमारा समाज समानता की बात से आज भी यौगिक तटस्थता बनाये
रखना चाहते हैं। बात भले ही जनतंत्र की हो रही हो या कि समाजवाद की, हम बराबर
की आंख से नहीं देख पाते। हम जन्मजात अईंचा / काना हैं। मुझे बरबस गोरख पाण्डेय की
मशहूर कविता 'समाजवाद
बबुआ ...' की चंद पंक्तियाँ याद
आ रही हैं। सरकारी और निजी स्कूलों के दृश्य आँखों
के सामने रखकर सोचता हूँ तब याद आता
है: ‘बड़का के बड़हन, छोटका के
छोटहन / बखर बराबर बंटाई, समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई’।
जो लोग स्कूली बच्चों की मौत को हादसा मान रहे हैं, उनकी नीयत में मुझे खोट दीखती है। ये लोग अपनी सुविधा से विस्मरण
आसन करने में अभ्यस्त व सिद्धहस्त हैं। सभी एक
दूसरे को अन्दर तक जानते हैं, इसीलिए सब चुप हैं। सत्ता के खेल में शामिल सभी
चुप हैं: पक्ष भी विपक्ष भी। कोई इसे हादसा कह रहा है तो
कोई साज़िश तो कोई सुनियोजित शिशु-बध। कोई कुछ भी कहे, क्या फर्क पड़ता है? यह किसी एक सरकार की
विफलता नहीं है। जीतनी बड़ी विफलता यह नीतीश कुमार
की है उतनी ही हमारी पूरी राजनीतिक-व्यवस्था की भी है। नीतीश की इसलिए कि उनसे यह उम्मीद
नहीं थी कि उनकी सरकार दलित, महादलित व अति-पिछड़े तबके के प्रति इतनी उदासीन हो सकती है। उनकी राजनीति के यही मूलाधार रहे हैं। खैर, पूंजीवादी लोकतंत्र में नेता की कथनी-करनी में अंतर न हो तो ही अजब। कुछ हद तक मुझे नीतीश, लालू, मोदी (सुशील) और कांग्रेस की उदासीनता समझ आती है, किन्तु दलित नायकों / नायिकाओं / बुद्धिजीवियों की
चुप्पी समझ से परे लगती है। अगर दलित समाज भी सरकारी शिक्षा-प्रबंधन के प्रति उदासीन
हो गया तो जान लीजिये कि यह तबका फिर किसी दूसरे संसाधन के ज़रिये शिक्षित
नहीं हो सकता। निजी शिक्षा बहुलांश दलित समाज के लिए आज भी दूर की कौड़ी है। जिस समाज के बच्चे सिर्फ भोजन के लिए स्कूल जाते हों, उस समाज को यह तो तय करना ही होगा कि वह
अपने बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या करने जा रहा है? जिस तरह मिड डे मील गरीब बच्चों का हक है, उसी तरह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी उनका हक
है। इसीलिए शिक्षा सुधार के प्रयासों में दलित की भागीदारी और अगुवाई दोनों की
अपेक्षा की जाती है।
एक बात और। इस हादसे के बाद यह स्वीकार
करने में किसी को कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि भ्रष्टाचार गरीबों के
लिए जानलेवा है। भ्रष्टाचार के मुद्दे को सिर्फ आर्थिक अपराध मानना गरीबों के साथ
क्रूर मजाक है। हमें इसकी परिभाषा बदलनी पड़ेगी और इसकी सजा भी। भारत का गरीब
भ्रष्टाचार के अत्याचार को अब और नहीं बर्दाश्त कर सकता।
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