आ, अब लौट चलें …
वो भी क्या दिन थे जब हम कंद-मूल खाकर नदी-निर्झर का पानी पी लेते थे और मस्त रहते थे। शीत व वर्षा से सुरक्षा के लिए कंदराएं थीं तो तपन से सुरक्षा के लिए तरुवर की शीतल छाया
थी। तरुवर की छाया में हम विश्राम
के साथ साथ प्रभु
का गुणगान भी करते रहते थे। तब हमारी
प्रकृति इतनी आध्यात्मिक
हुआ करती थी कि
राह चलते हमें ईश्वर
के दर्शन हो जाते थे। शर्तिया मोक्ष का इससे बेहतर अवसर हमें किसी दूसरे युग में
नसीब न हो सका। लेकिन ऐसा नसीब हमें मिलता भी तो कैसे? अध्यात्म की बगिया में आग भी तो हमीं ने लगाई थी; अब रोना तो पड़ेगा ही। हम अपना मूलाधार भूल गए और अज्ञानी-अंधा होकर थोथा के पीछे
दौड़ते लगे। नतीजा सामने है। कलतक हम विश्व-गुरु थे लेकिन आज फिसड्डी बन गए
हैं। कहाँ तो दुनिया
आती थी हमारे आँगन में ज्ञान के मोती चुगने; कहाँ आज हम दुनिया से मनुहार कर रहे हैं कि 'हमका
भी साथ ले ले’। रोना आता है कि हम क्या थे, क्या
हो गए और क्या होंगे अभी।
जहाँ दूसरे लोग सिर्फ खुली आँखों से दुनिया देख पाते थे, वहीं हम बंद आँखों से ही पूरी
दुनिया देख लेते थे। उनके पास सिर्फ दृष्टि थी तो हमारे पास दिव्यदृष्टि। उन्हें सिर्फ सामने की दुनिया दीखती थी
जबकि हम घटित के साथ साथ अघटित भी देख लेते थे। सच तो ये है कि अगर महाभारत के संजय की कारस्तानियों की मुक़म्मल जानकारी दुनिया को पहले से होती
तो वह टेलीफोन व टी.वी. जैसे खिलौनों के आविष्कार पर इतना नहीं इतराती। इसे कर्म
का फेर नहीं तो और क्या कहेंगे कि आज इन्हीं खिलौनों में उलझकर हम अपने आप को आधुनिक कह रहे हैं। कौन नहीं जानता कि हमसे पहले किसी भी राष्ट्र को काल-चक्र
व उसके प्रभावों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी? विकास में विनाश की झलक सबसे पहले हमें ही दिखाई पड़ी थी। सबसे
पहले हमें ही पता चला था कि समय के साथ साथ हमारा दैहिक, दैविक
और भौतिक ह्रास होता जायेगा और हम सतयुग से
चलते हुए कलयुग में पहुँच जायेंगे।
आज हम हताश-निराश चारों खाने चित्त ज़मीन पर पड़े कराह रहे हैं। इस घोर विकट विपत्ति
से हमें कौन निजात दिलाएगा?
गुलामी को नियति माने बैठे जो लोग आज भी मलेच्छों व आक्रांताओं के तलुवे सहला रहे हैं, वे तो कतई नहीं। पाप का घड़ा भर चूका है, अब इसे फूटना ही होगा। आर्यावर्त की पावन धरा सदैव विकल नहीं बनी रहेगी क्योंकि कल्कि रूप में
विष्णु भगवान का अवतार अब से लगभग 5-6 दशक
पहले ही हो चूका है। गुजरात के किसी गरीब पिछड़ी जाति के परिवार में जन्मे कल्कि भगवान नागपुर के गुरुकुल से शिक्षित-दीक्षित
होकर कई सालों से मलेच्छों और उनके संगी-साथियों के खिलाफ अकेले लड़ते हुए फतह-दर-फतह
हासिल किये जा रहे हैं। लेकिन विडम्बना देखिये कि मद-काम-लोभ
से ग्रस्त भारत के दूसरे हिस्सों में रहनेवाले कुछ मूरख लोग आज भी इस अलौकिक आभा के सामने अपनी हेठी बघारे जा रहे हैं। लेकिन हम जानते हैं कि जब कंस, दुर्योधन और रावण की
हेठी नहीं चली तो इनकी क्या चलेगी। तरस आता है यह जानकर कि कल जब ये कीट-पतंगों और पिल्लों की तरह कुचले जायेंगे तो इनके
लिए कोई अपने दो बूँद आंसू भी जाया नहीं करेगा। पातक कर्म की इति ऐसे ही होती है कि घर-परिवार में ‘रहा न कोई रोवनहारा’।
तो अब तय है कि हम फिर से कलयुग
से सतयुग में वापसी करेंगे। लेकिन इसके लिए देश को चुस्त और मुश्तैद होकर भगवत्स्वरूप मोदी के
लोककारी व मोक्षकारी कार्यक्रमों को अमली जामा पहनाना होगा। मोदी
रचित नव- गीता के तीन सूत्रीय कार्यक्रम निम्नांकित हैं:
1. गायत्री मंत्र में बिद्ध परमाण्विक सिद्धांतो / सूत्रों के आधार पर पुरे
देश में परमाणु-संयत्र स्थापित करना
इस संयत्र में धातु की चादर की ज़गह मंत्र-पूत चन्दन
की लकड़ी का उपयोग किया जायेगा। यह विकल्प संयत्र को पवित्र भी बनाये रखेगा और
मज़बूत भी। संयत्र की चंदनी दीवारों पर साप्ताहिक रूप से गोबर का लेप चढ़ाया जायेगा ताकि संयत्र में प्रशीतन का काम सतत रूप से चलता
रहे। इस प्रक्रिया के अनुपालन से हम पश्चिमीकरण से कन्नी काटते
हुए सीधे आधुनिक हो जायेंगे।
2. देशज शिक्षा को पुनर्स्थापित करना
इसके लिए मदरसों तथा सरकारी और
निजी स्कूलों की ज़गह गुरुकुल स्थापित किये जायेंगे जिसमें सिर्फ बाभन-ठाकुर के लडके ही पढ़ सकेंगे। स्त्री व
दलित शिक्षा को धर्म-विरोधी करार दिया जायेगा।अलबत्ता, उनके लिए पेशवर शिक्षा की व्यवस्था ज़रूर की जा सकती है।
स्त्री शिक्षा के लिए स्कूल-कॉलेज की ज़रूरत नहीं होगी क्योंकि उनके लिए ज़रूरी
संस्कारगत आचरण व मर्यादा की शिक्षा परिवार के अन्दर ही उपलब्ध रहेगी। सभी छात्रों
के लिए धोती व जनेऊ पहनना तथा चुटिया रखना अनिवार्य होगा। शिक्षक का दायित्व भारतीय संस्कृति के सजग प्रहरी साधुसंत करेंगे। पाठ्यक्रम का निर्धारण
नागपुर में स्थित ज्ञान-कुल के नामी-गिरामी हिन्दू राष्ट्रवादी करेंगे।
3 हिन्दू राष्ट्रवाद की स्थापना करना
जब भारत में मलेच्छ व ईसाई नहीं थे तो यह देश
ज्ञान-विज्ञानं के क्षेत्र में दुनिया में अव्वल था। हम कंडे की चाबुक को मिसाइल बना लेते थे और उसे धनुष की
प्रत्यंचा पर चढ़ाकर लांच कर लेते थे। एक ही पुष्पक विमान पर सवार होकर सभी देशवासी दूर देश की यात्रा कर आते थे फिर भी उसमें एक सीट खाली रहती थी। ऐसा इसलिए संभव हो पाया था कि हमारे संत-मुनि एक ऐसे
धातु की खोज कर सके थे जिसके प्रत्यास्थता गुणांक का मान असीम होता था। ऐसे धातु से बना मशीन असीम लचीला होता है जिसे
चाहत के हिसाब से बढाया जा सकता है। खैर, चिंता की कोई बात नहीं है।
हम अब से भी सजग हो गए तो सबकुछ ठीक हो जायेगा। इसके लिए हमें अपने विचार, संस्कार व व्यवहार में आमूल-चूल परिवर्तन लेन होंगे।
सबसे पहले सभी नागरिकों के लिए अनिवार्य होगा कि वे अपने घर की
दीवारों पर स्वस्तिक उकेरें; स्नान-ध्यानादि के पश्चात सूर्य नमस्कार करें; गाय और राष्ट्र को माता मानें; संतो-योगियों-मुनियों के प्रति मन में असीम श्रद्धा का
भाव रखें; वैदिक धर्म की रक्षा में हिंसा
करने से भी गुरेज़ न करें। भारतीय संस्कृति के दामन पर लगे अशेष दागों को अविलम्ब
हटायें तथा नियमित रूप से हवन का आयोजन कर पर्यावरण को दूषित होने से बचाएं।
धर्म-सत्ता समय-समय पर और भी अनुदेश जारी करती रहेगी
जिसका अक्षरशः अनुपालन अनिवार्य होगा।